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संघ उत्सव हिन्दू साम्राज्य दिवस। hindu samrajya diwas | rss utsaw

संघ उत्सव हिन्दू साम्राज्य दिवस

hindu samrajya diwas | Rss festival

हिन्दू साम्राज्य दिवस। hindu samrajy diwas

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार वर्ष में एक बार निरंतर हिंदू साम्राज्य दिवस पर्व मनाता है आ रहा है। आज जब हिंदू अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है ,तो यह पर्व हर हिंदू के लिए गौरव प्रदान करने का अवसर देता है। हिंदू अपने गौरव के क्षणों को याद कर सकता है ,उसके विचारों ,अपने पूर्वजों से कुछ सीख सकता है।

हिन्दू साम्राज्य दिवस
हिन्दू साम्राज्य दिवस

 

 

हिन्दू साम्राज्य दिवस क्या है ? महत्व

हिंदू साम्राज्य दिवस को समझने से पहले आपको मुगलों तुर्को के आक्रमण के  समय की पृष्ठभूमि को जानना आवश्यक है। जब भारत पर यवन , तुर्क व मुगलों का आक्रमण हुआ। तब भारत में छोटी-छोटी रियासतें हुआ करती थी। राजा अपने और केवल अपने राज्य का ही भला चाहते थे जनता उस राजा के राज्य की सीमा को देश मानकर उसके प्रति अपनी भक्ति प्रकट किया करते थे।

महत्वपूर्ण बात तो यह थी कि राजा आपस में एक दूसरे के प्रति कटुता वह अविश्वास का भाव रखते थे। आपस में लोग कटुता , संकुचित मानसिकता का एक उदाहरण जयचंद है। जिसने मुगलों को अपने घर में आने का निमंत्रण दिया। जयचंद के इस कृत्य से शिवाजी महाराज ने उन्हें हिंदू भाई के नाते एक पत्र लिखा। जिसमें उन्हें भारत माता व हिंदू के गौरव के प्रति अपना मत रखा और यह भी आश्वासन दिया कि वह स्वयं संपूर्ण भारत पर राज्य चाहते हैं तो मैं स्वयं  तुम्हारी सेना का अग्रणी सैनिक होऊंगा किंतु किसी विदेशी ताकत को भारत मां के आंचल को लहू से रंगने नहीं दूंगा।

 

 

hindu samrajy diwas हिन्दू साम्राज्य दिवस
हिन्दू साम्राज्य दिवस

 

एक सामान्य हिंदू इस पत्र को पढ़कर महात्मा बन जाता किंतु जयचंद एक मोड़ व लोग के वशीभूत होकर उस पत्र पर विचार नहीं किया। जिस पर शिवाजी महाराज ने हिंदू  को एकजुट करने के लिए हिंदू साम्राज्य दिवस का आरंभ किया।

 

 

हिन्दू साम्राज्य दिवस
हिन्दू साम्राज्य दिवस

 

 

हिन्दू साम्राज्य दिवस क्यों मनाते ? कारण

वैसे तो भारत में अनेकों पर्व व उत्सव वर्ष भर चलता रहता है। किंतु यह पर्व किसी बिना भेदभाव के हिंदू की गरिमा को बनाए रखने उसके अस्तित्व की रक्षा के लिए इसे मनाना आज के संदर्भ में और उपयोगी है। क्योंकि जहां आज गैर हिंदू की जनसंख्या गुणात्मक रूप से विकास कर रही है। वही हिंदू अपने संकुचित रुप मैं सिमटा  जा रहा है। आज का समाज जहां कमाई और धन का अर्जन करने में व्यस्त है। वहीं कहीं ना कहीं मानव को अपने धर्म व आस्था से विरक्त कर रहा है। इस व्यस्त जीवन में अपने गरिमा का गुणगान करने स्वयं को संगठित करने अपने को उचित जीवन शैली को अपनाने जनकल्याण भाव को जगाने के लिए हिंदू साम्राज्य दिवस मनाना वर्तमान में और उपयोगी होता जा रहा है।

अमृत वचन हिन्दू साम्राज्य दिवस के लिए

यदुनाथ सरकार कहते हैं कि शिवाजी के राजनैतिक आदर्श इतने श्रेष्ठ थे कि आज भी हम उन्हें जैसे के तैसे स्वीकार कर सकते हैं। उनका उद्देश्य था प्रजा को सुख पहुँचाना। व्यापक सहिष्णुता में वे विश्वास रखते थे। उनके राज्य  में सर्वजाति – पाति तथा उपासना , पंथ , उपपंथों के लिए उन्नति का द्वार खुला था। उनकी राज्य व्यवस्था जान कल्याणकारी , कार्यक्षम तथा निर्दोष थी।

 

हिन्दू साम्राज्य दिवस
हिन्दू साम्राज्य दिवस

 

भारतीय इतिहास में दो ऐसे पत्र मिलते हैं जिन्हें दो विख्यात महापुरुषों ने दो कुख्यात व्यक्तिओं को लिखे थे-

पहिला पत्र “जफरनामा” कहलाता है। जिसे श्री गुरु गोविन्द सिंह ने औरंगजेब को भाई दया सिंह के हाथों भेजा था। .यह दशम ग्रन्थ में शामिल है।

दूसरा पत्र ” शिवाजी “ ने आमेर के राजा जयसिंह को भेजा था। जो उसे 3 मार्च 1665 को मिल गया था। इन दोनों पत्रों में यह समानताएं हैं की दोनों फारसी भाषा में शेर के रूप में लिखे गए हैं। दोनों की प्रष्ट भूमि और विषय एक जैसी है। दोनों में देश और धर्म के प्रति अटूट प्रेम प्रकट किया गया है।

शिवाजी का पत्र बरसों तक पटना साहेब ( बिहार )के गुरुद्वारे के ग्रंथागार में रखा रहा। बाद में उसे “बाबू जगन्नाथ रत्नाकर “ने सन 1909 अप्रेल में काशी नागरी प्रचारिणी सभा से प्रकाशित किया था। बाद में “अमर स्वामी सरस्वती ने उस पत्र का हिन्दी में पद्य और गद्य ने अनुवाद किया था.फिर सन 1985 में अमरज्योति प्रकाशन गाजियाबाद ने पुनः प्रकाशित किया था।

राजा जयसिंह आमेर का राजा था ,वह उसी राजा मानसिंह का नाती था , जिसने अपनी बहिन अकबर से ब्याही थी। जयसिंह सन 1627 में गद्दी पर बैठा था और औरंगजेब का मित्र था। औरंगजेब ने उसे 4000 घुड सवारों का सेनापति बना कर “मिर्जा राजा “ की पदवी दी थी। औरंगजेब पूरे भारत में इस्लामी राज्य फैलाना चाहता था। शिवाजी के कारण वह सफल नही हो रहा था। औरंगजेब चालाक और मक्कार था। उसने पहले तो शिवाजी से से मित्रता करनी चाही और दोस्ती के बदले शिवाजी से 23 किले मांगे। लेकिन शिवाजी उसका प्रस्ताव ठुकराते हुए 1664 में सूरत पर हमला कर दिया और मुगलों की वह सारी संपत्ति लूट ली जो उनहोंने हिन्दुओं से लूटी थी।

फिर औरंगजेब ने अपने मामा शाईश्ता खान को चालीस हजार की फ़ौज लेकर शिवाजी पर हमला करावा दिया और शिवाजी ने पूना के लाल महल में उसकी उंगलियाँ काट दीं और वह भाग गया।

 

 

फिर औरंगजेब ने जयसिंह को कहा की वह शिवाजी को परास्त कर दे। जयसिंह खुद को राम का वंशज मानता था। उसने युद्ध में जीत हासिल करने के लिए एक सहस्त्र चंडी यग्य भी कराया। शिवाजी को इसकी खबर मिल गयी थी जब उन्हें पता चला की औरंगजेब हिन्दुओं को हिन्दुओं से लड़ाना चाहता है।  जिससे दोनों तरफ से हिन्दू ही मरेंगे। तब शिवाजी ने जयसिंह को समझाने के लिए जो पत्र भेजा था ,उसके कुछ अंश हम आपके सामने प्रस्तुत कर रहे है –

 

छत्रपति शिवाजी महाराज का पत्र राजा जयसिंह के नाम। Letter of Shivaji for King Jayshingh

शिवजी का पत्र  हिंदी अनुवाद –

हे रामचंद्र के वंशज ,तुमसे तो क्ष त्रिओं की इज्जत उंची हो रही है 

सूना है तुम दखन कि तरफ हमले के लिए आ रहे हो

तुम क्या यह नही जानते कि इस से देश और धर्म बर्बाद हो जाएगा.

अगर मैं अपनी तलवार का प्रयोग करूंगा तो दोनों तरफ से हिन्दू ही मरेंगे

उचित तो यह होता कि आप धर्म दे दुश्मन इस्लाम की जड़ उखाड़ देते

आपको पता नहीं कि इस कपटी ने हिन्सुओं पर क्या क्या अत्याचार किये है

इस आदमी की वफादारी से क्या फ़ायदा .तुम्हें पता नही कि इसने बाप शाहजहाँ के साथ क्या किया

हमें मिल कर हिंद देश हिन्दू धर्म और हिन्दुओं के लिए लड़ाना चाहिए

हमें अपनी तलवार और तदबीर से दुश्मन को जैसे को तैसा जवाब देना चाहिए

अगर आप मेरी सलाह मामेंगे तो आपका लोक परलोक नाम होगा .

 

 

 

 

पत्र फ़ारसी शायरी रूप में –

1 -जिगरबंद फर्जानाये रामचंद -ज़ि तो गर्दने राजापूतां बुलंद

2 -शुनीदम कि बर कस्दे मन आमदी -ब फ़तहे दयारे दकन आमदी .

3 -न दानी मगर कि ईं सियाही शवद-कज ईं मुल्को दीं रा तबाही शवद ..

4 -बगर चारा साजम ब तेगोतबर -दो जानिब रसद हिंदुआं रा जरर.

5 -बि बायद कि बर दुश्मने दीं ज़नी-बुनी बेख इस्लाम रा बर कुनी .

6 -बिदानी कि बर हिन्दुआने दीगर -न यामद चि अज दस्त आं कीनावर .

7 -ज़ि पासे वफ़ा गर बिदानी सखुन -चि कर्दी ब शाहे जहां याद कुन

8 -मिरा ज़हद बायद फरावां नमूद -पये हिन्दियो हिंद दीने हिनूद

9 -ब शमशीरो तदबीर आबे दहम -ब तुर्की बतुर्की जवाबे दहम .

10 -तराज़ेम राहे सुए काम ख्वेश -फरोज़ेम दर दोजहाँ नाम ख्वेश

 

इस पत्र से आप खुद अंदाजा कर सकते है। शिवाजी का देश और धर्म के साथ हिन्दुओ के प्रति कितना लगाव था। हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि हम उनके अनुयायी है। हमें उनके जीवन से सीखना चाहिए तभी हम सच्चे देशभक्त बन सकते हैं।

 

सन् 1674 में ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी को शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ था, जिसे आनंदनाम संवत् का नाम दिया गया। महाराष्ट्र में पांच हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित रायगढ़ किले में एक भव्य समारोह हुआ था। इसके पश्चात् शिवाजी पूर्णरूप से छत्रपति अर्थात् एक प्रखर हिंदू सम्राट के रूप में स्थापित हुए।

 

महाराष्ट्र में यह दिन “शिवा राज्यारोहण उत्सव” के रूप में मनाया जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसे हिंदू साम्राज्य दिनोत्सव के रूप में मनाता है। इसका कारण स्पष्ट है। एक किशोर के रूप में शिवाजी ने हिंदवी स्वराज स्थापित करने की प्रतिज्ञा ली थी न कि अपना राज्य स्थापित करने की। उन्होंने इस बात की भी घोषणा की थी कि यह ईश्वर की इच्छा है, इसमें सफलता निश्चित है। उन्होंने अपनी शाही मोहर में यह बात अंकित की थी कि शाहजी के पुत्र शिवाजी की यह शुभ राजमुद्रा शुक्ल पक्ष के प्रथम दिवस के चंद्रमा की भांति विकसित होगी और समस्त संसार इसका मंगलगान करेगा।

 

यहां तक कि राज्याभिषेक के समय भी समारोह का विशिष्ट हिंदू चरित्र साफ उभरकर सामने आया था। तमिलनाडु से एक प्रतिभाशाली किशोर कवि जयराम शिवाजी की काव्य प्रशस्ति गाने के लिए आया तो एक प्रसिद्ध वैदिक विद्वान गंगा भट्ट काशी से चलकर आए। उन्होंने शिवाजी को एक संप्रभु हिंदू राजा के रूप में प्रतिष्ठापित करने के लिए एक नए आध्यात्मिक भाष्य की रचना की। देश भर से सात पवित्र नदियों का जल शिवाजी के मंगल स्नानके लिए लाया गया।

 

इससे पूर्व जब शिवाजी औरंगजेब से भेंट करने आगरा गए थे तब जाति, भाषा, पांथिक प्रथाओं की परवाह न करते हुए समस्त जनता उनके सम्मान के लिए रास्ते में एकत्र हो गई। अमानवीय मुस्लिम शासन के तहत पिस रही हिंदू जनता ने स्पष्ट रूप से उन्हें एक नई आशा की किरण के रूप में देखा।

 

शिवाजी को परास्त करने के लिए औरंगजेब के सेनापति के रूप में दक्षिण आए राजस्थान के राजा जयसिंह को उन्होंने एक लंबा पत्र लिखा था। इस पत्र में शिवाजी ने जयसिंह को हिंदुस्थान को मुस्लिम युग से मुक्त करवाने में प्रमुख भूमिका स्वीकार करने की अपील की थी और स्वयं उनके कनिष्ठ सहयोगी के रूप में साथ देने की बात कही थी। पर जयसिंह के ऊपर मुगलों का प्रभाव इस कदर हावी था कि उन्होंने शिवाजी की राष्ट्रभक्ति की अपील को अनसुना कर दिया।

 

बाद में बुंदेलखंड (अब वर्तमान मध्य प्रदेश में) के राजा छत्रसाल स्वराज के लिए शिवाजी के झंडे तले लड़ने के लिए आए। पर शिवाजी ने उन्हें वापस भेजकर, वहीं एक शक्तिशाली हिंदू शक्ति के निर्माण की सलाह दी, जिससे हिन्दू शक्ति का मुस्लिम प्रभुत्व पर चहुंओर से आक्रमण हो सके।

 

शिवाजी के उत्तराधिकारियों के रूप में पेशवाओं ने भगवा ध्वज को काबुल तक फहरा दिया और अंतत: मुगल सत्ता, जो कि अनेक शताब्दियों तक चुनौतीहीन रही थी, को पूर्ण रूप से विनष्ट कर दिया। उन्होंने छत्रपति शिवाजी के जीवन-लक्ष्य को सही रूप में समझा था।

 

एक बार स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि श्री राम और श्री कृष्ण के समान शिवाजी धर्म की स्थापना के लिए जन्म लेने वाले एक आदर्श हिंदू राजा थे।

 

और आखिर में शिवाजी के राज्याभिषेक के भव्य समारोह का क्या महत्व था? पहला, इसने सभी को भारत के हिंदू चरित्र और एक नए राज्य के उद्देश्य से परिचित करवाया। उससे भी महत्वपूर्ण, उस समय तक कई हिंदू सरदार राजा थे- उन्हें किसी मुस्लिम सम्राट ने ही यह उपाधि प्रदान की थी। यहां तक शिवाजी के पराक्रमी पिता भी एक ऐसे ही सरदार थे। मेवाड़ और बुंदेलखंड को छोड़कर कोई भी अपनी ताकत के बूते राजा नहीं था। यहां तक कि इन दोनों के पास भी भारतभर में हिंदू राज्य स्थापित करने की दृष्टि नहीं थी। शिवाजी का प्रसंग तो बिल्कुल भिन्न था। बीजापुर के सुल्तान के तहत एक “छोटे” राजा के रूप में उन्होंने दक्षिण में मुगलों के ठिकानों पर आक्रमण करके दिल्ली के सिंहासन को चुनौती दी थी। वे उन प्रारंभिक शासकों में से एक थे जिन्होंने समुद्री युद्ध की सर्वोच्च महत्ता को समझते हुए पश्चिमी तट पर दुर्गों का निर्माण किया और समुद्री जहाजों का प्रयोग किया। उन्होंने मतान्तरण के आसन्न खतरों को भांपते हुए अंग्रेज मिशनरियों को चेतावनी दी और आदेशों की अवहेलना करने पर उनमें से चार को मृत्युदंड दिया। उनके पुत्र संभाजी और बाद के सेनापतियों ने शिवाजी की पंरपरा को कायम रखा और पश्चिमी तट पर अंग्रेजों और पुर्तगालियों के वर्चस्व को समाप्त करने के अथक प्रयत्न किए।

 

शिवाजी के किसी अन्य कार्य से अधिक, उनकी मृत्यु के बाद हुई घटनाओं और अविश्वसनीय रूप से संभाजी के बर्बरतापूर्ण बलिदान ने उस दृष्टि और उद्देश्य को उजागर किया था, जो शिवाजी ने अपनी विरासत के तौर पर छोड़ा था। शिवाजी के न रहने पर औरंगजेब स्वयं उनके राज्य पर चढ़ आया और उसे रौंद डाला। पर शीघ्र ही समूचा क्षेत्र मानो दावानल बन गया। प्रत्येक घर एक किला और शारीरिक रूप से योग्य हर युवा हिंदवी स्वराज का सैनिक बन गया था।

 

अप्रतिम वीरता और छापामार पद्धति के नए सेनापति सामने आए, जिन्होंने शत्रुओं की सेना पर जोरदार हमले किए। उनमें से एक धनाजी तो औरंगजेब के शाही तंबू तक जा पहुंचा था, पर दुर्भाग्य से औरंगजेब वहां नहीं था। धनाजी उसके शाही तंबू का स्वर्ण चिन्ह लेकर लौटा था। अपनी विशाल सेना और सभी पारंगत योद्धाओं के बावजूद औरंगजेब को चार वर्ष तक चले लंबे संघर्ष में आखिरकार स्वराज की धूल खानी पड़ी और उसकी कब्रा दक्षिण में औरंगाबाद, जिसका नाम अब संभाजी नगर रख दिया गया है, में ही बनी। उसके साथ ही मुगलों के उत्कर्ष और उनकी ताकत का भी अंत हो गया। और इस तरह स्वराज के चढ़ते सूरज के साथ भगवा प्रभात का आगमन हुआ

 

 

राम – राज फिर आएगा , घर – घर भगवा छाएगा

भगवा अग्नि का प्रतीक है। जिस प्रकार अग्नि सारी बुराइयों को जलाकर स्वाहा कर देती है , उसी प्रकार भगवा भी सारी बुराइयों को समाज से दूर करने का प्रयत्न कर रहा है। संपूर्ण भारत भगवामय हो ऐसा संघ का सपना है। यहाँ हमारा भगवा से आशय बुराई मुक्त समाज से है।

इस भगवा ध्वज को ‘ श्री रामचंद्र ‘ ने राम – राज्य में ‘ हिंदूकुश ‘ पर्वत पर फहराया था , जो हिंदू साम्राज्य के वर्चस्व का परिचायक है।  इसी भगवा ध्वज को ‘ वीर शिवाजी ‘ ने मुगल व आताताईयों को भगाने के लिए थामा था। वीरांगना लक्ष्मीबाई ने भी साँस छोड़ दिया , किंतु भगवा ध्वज को नहीं छोड़ा।

इस भगवा प्लेटफार्म से हम हिंदू अथवा हिंदुस्तान के लोगों से एक सभ्य व शिक्षित समाज की कल्पना करते हैं। जिस प्रकार से राम – राज्य में शांति और सौहार्द का वातावरण था , वैसे ही राज्य की कल्पना हम इस समाज से करते हैं।

 

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