शांतनु - सत्यवती का मिलन प्रसंग  और ' भीष्म ' प्रतिज्ञा

महाभारत कथा शांतनु सत्यवती का मिलन | shantnu and satyawati story from sampoorna mahabharat

शांतनु – सत्यवती का मिलन प्रसंग  और ‘ भीष्म ‘ प्रतिज्ञा

 

गंगा द्वारा शांतनु ( हस्तिनापुर के राजा ) को पुत्र रूप में देवव्रत की प्राप्ति के बाद शांतनु अपने राग – रंग में डूब कर धीरे-धीरे पुरानी सारी स्मृतियों को भूलते गए। चार  वर्ष व्यतीत हुए होंगे की एक  दिन शांतनु यमुना के किनारे आखेट ( शिकार )खेल रहे थे। जंगल के किनारे का वातावरण एक दिव्य सुगंध से भरा हुआ था। इस सुगंध के आगे कस्तूरी की सुगंध फीकी   थी।

महाराज शांतनु इस दिव्य सुगंध की खोज में निकल पड़े। इस सुगंध के उद्गम स्थल को खोजते – खोजते  महाराज शांतनु यमुना नदी के किनारे खड़ी एक नाव तक पहुंचे। उस नाव पर  बैठी एक सुंदर युवती से यह दिव्य सुगंध आ रही थी। शांतनु ने उस युवती का परिचय पूछा उस युवती ने अपना परिचय सत्यवती ,  दासराज ( मल्लाहराज ) की पुत्री के रूप में दिया।

सत्यवती का यह दिव्य सुगंध पराशर मुनि द्वारा प्रदत था। पराशर मुनि  ने सत्यवती को मत्स्य की दुर्गंध से मुक्ति दी और दिव्य सुगंध प्रदान किया साथ ही कुमारी रहने का भी वरदान दिया था । महाराज शांतनु ने सत्यवती से प्रणय निवेदन किया , किंतु सत्यवती ने जवाब में महाराज शांतनु को यह कहा ! कि उन्हें मेरे पिता से अनुमति लेनी होगी। पिता कि जो इच्छा होगी वह मुझे स्वीकार्य है।

 

शांतनु का सत्यवती के पिता से मिलना –

महाराज शांतनु ने सत्यवती के पिता दासराज के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा। दासराज के हर्ष का कोई ठिकाना ना था। दासराज अति प्रसन्न हुए और राजा की तारीफ करने लगे। मेरी पुत्री को आप जैसा सुयोग्य वर कहां मिलेगा। आपके जैसा राजा इस संसार में अभी तक नहीं हुआ। यह मेरी पुत्री का सौभाग्य है कि आप उसे पति रूप में मिलेगें।  किंतु आपको मेरी पुत्री से विवाह करने से पूर्व , मुझे एक वचन देना होगा।

शांतनु ने पूछा कैसा वचन ?

दासराज ने  महाराज शांतनु से कहा ! सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर की राजगद्दी पर बैठेगा , ऐसा वचन मुझे दीजिए। यह सुनकर शांतनु ने ऐसा वचन देने से मना कर दिया। दासराज अपने वचन पर कायम रहे , शांतनु निराश होकर हस्तिनापुर लौट आये । महाराज शांतनु हस्तिनापुर के उत्तराधिकारी देवव्रत को मिले सम्मान वह उसके अधिकार को छीनना नहीं चाहते थे।

 

शांतनु – सत्यवती के विरह समय   –

महाराज शांतनु , दासराज के यहां से लौट कर आए , किन्तु उदास रहने लगे। उनका स्वास्थ्य गिरता जा रहा था।  मन राज – काज में नहीं लगता , दिन-रात सत्यवती को स्मरण करते रहते। देवव्रत ने पिता शांतुन महाराज के उदासी का कारण जानना चाहा , देवव्रत ने  पिता से चिंता का कारण पूछा ? किंतु शांतनु ने राष्ट्र की चिंता बताते हुए अपने वास्तविक चिंता को छुपा कर रखा। देवव्रत ने स्पष्ट किया ” हजारों वाणों को मेरा शरीर सहन कर सकता है , किंतु आपकी चिंता को सहन नहीं कर सकता।”  

देवव्रत से पिता की यह चिंता सहन नहीं हुई वह  इस चिंता के रहस्य को ढूंढने का प्रयत्न करते रहे। देवव्रत ने सारथि  से घटना का सारा हाल पूछा और उनके चिंता का कारण खोज निकाला।

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देवव्रत का दासराज से मिलना और ‘ भीष्म ‘ प्रतिज्ञा –

देवव्रत को जब चिंता के मूल कारण का पता चला। वह तुरंत ही दासराज के पास जा पहुंचे।  दासराज अपने वचन पर अडिग थे , वह वचन लिए बिना अपनी कन्या का विवाह करने को तैयार ना हुए। देवव्रत ने पिता के चिंता को दूर करने के लिए दासराज को वचन दिया , कि ” मैं देवव्रत सभी देवों को साक्षी मानकर वचन देता हूं , कि हस्तिनापुर के सिंहासन पर मैं अपना कोई अधिकार नहीं मांगूंगा। सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी होगा। “

शांतनु - सत्यवती का मिलन प्रसंग  और ' भीष्म ' प्रतिज्ञा
शांतनु – सत्यवती का मिलन प्रसंग  और ‘ भीष्म ‘ प्रतिज्ञा

इस कठोर और ‘ भीष्म प्रतिज्ञा ‘ को सुनकर आकाश से पुष्प की वर्षा होने लगी। सभी देवतागण – तुम! महान हो , धन्य हो , धन्य महावीर के जयघोष करने लगे।  इस कठोर प्रतिज्ञा से उनका नाम भीष्म हो गया।

दासराज ने यह प्रतिज्ञा सुनकर अपनी कन्या को देवव्रत के साथ हस्तिनापुर भेज दिया। देवव्रत का यह त्याग आज तक देखने को नहीं मिलता एक पुत्र ने अपने पिता की खुशी के लिए पूरा जीवन ही समर्पित कर दिया। देवव्रत , सत्यवती को लेकर हस्तिनापुर लौट आए।

महाराज शांतनु और सत्यवती का विवाह बड़े ही धूमधाम से मनाया गया। महाराज शांतनु सत्यवती के रूप में इतना मोहित थे  कि उन्होंने देवव्रत के त्याग को कदापि न पहचाना।  भविष्य में सत्यवती के दो पुत्र हुए चित्रांगद और विचित्रवीर्य। 

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