रक्षाबंधन आरएसएस | रक्षाबंधन उत्सव हेतु आवश्यक सामग्री | rakshabandhan utsav in RSS

रक्षाबंधन | रक्षाबंधन उत्सव हेतु आवश्यक सामग्री | rakshabandhan rss utsav  |

रक्षाबंधन उत्सव हेतु आवश्यक सामग्री

 

साफ-साफ संघ  स्थान पर चूने द्वारा उचित रेखांकन ।

चूना ,नील ,गेरू ,आदि से ध्वज मंडल की सुंदर सज्जा ।

ध्वज ,ध्वज दंड ,स्टैंड ,माला ,पिन ,धूप ,अगरबत्ती माचिस आदि।

परम पूज्य डॉक्टर जी व श्री गुरुजी के चित्रों को सजाकर रखने की उचित व्यवस्था मालाएं, चादर, चांदनी आदि।

पूजन हेतु थाली में रोली ,चावल ,एवं पुष्प ।

आवश्यक सामग्री हो तो ध्वनि वर्धक की व्यवस्था करें।

रक्षाबंधन हेतु राखी की अलग से व्यवस्था करें।

उत्सव विधि

संपत

ध्वजारोहण

संघचालक जी एवं कार्यक्रम अध्यक्ष द्वारा ध्वज पूजन/ रक्षाबंधन

अधिकारी परिचय

अमृत वचन

एकल गीत

बौद्धिक वर्ग

अध्यक्षीय आशीर्वाद

प्रार्थना

ध्वजावतरण

रक्षाबंधन उत्सव विचारणीय बिंदु

हिंदू समाज में परंपराओं के निर्वाह का इतिहास इतना लंबा है कि ,कई परंपराओं का आरंभ कब कैसे और किस हेतु हुआ ।यह जानना कठिन ही नहीं अपितु असंभव सा प्रतीत होता है ।हिंदू समाज में मनाए जाने वाले विभिन्न उत्सवों त्योहारों की भी यही स्थिति है।

रक्षाबंधन जो हिंदू समाज का प्रमुख उत्सव है । उस का चलन कब और कैसे हुआ इसकी जानकारी के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं है ।पौराणिक जनश्रुति है कि देवासुर संग्राम के समय जब देवराज इंद्र युद्ध के लिए प्रस्थान करने लगे तो देव गुरु बृहस्पति तथा देवरानी शची ने उन्हें देव संस्कृति की रक्षा हेतु संकल्प बंद करने के उद्देश्य से मंत्रों से पवित्र किया रक्षासूत्र उनकी कलाई पर बांधा था।

संस्कृत साहित्य में एक अन्य घटना का वर्णन उपलब्ध है ।जिसके अनुसार भगवान विष्णु ने वामन अवतार का रूप धारण कर राजा बलि से तीन पग पृथ्वी की मांग की और तीन पग में न केवल राजा बलि का संपूर्ण राज्य नाप लिया अभी तो तीसरे पद में उसके शरीर को ले लिया और इस प्रकार राजा बलि के अहंकार को तोड़ा। यह कथा भी निम्न श्लोक की ओर इंगित करती है।

“येन बद्धो बलीराजा दानवेंद्रो महाबलाः।
तेन त्वाम प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।”

गुरुकुल के आचार्य धर्म प्रचारक तथा कुल पुरोहित अपने यजमान को यह श्लोक का स्मरण कराकर संस्कृति के मान बिंदुओं की रक्षा की प्रेरणा देकर संकल्पबद्ध करते थे और आज भी करते हैं।

आत्म रक्षा की आवश्यकता तथा शरण में आए किसी प्राणी की रक्षा करना हिंदू समाज में पावन उत्तरदायित्व समझा जाता है ।इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण आते हैं जब वीर पुरुष आत्मरक्षा और शरणागत की रक्षा के लिए अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करते थे ।इन वीरों को उत्साहित तथा प्रेरित करने के लिए वीर पत्नियां, सारी बहनें ,और माताएं ,रणभूमि हेतु प्रस्थान के पूर्व उन्हें रक्षासूत्र बांधकर उनकी रक्षा के लिए संकल्प करती थी। साथ ही वीरों की रक्षा के लिए  परमपिता से प्रार्थना करती थी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूज्य हेडगेवार जी ने संघ की कार्य पद्धति में हिंदू समाज में आदिकाल से प्रचलित तथा समाज का मार्गदर्शन करने वाले छह प्रमुख उत्सव के अवसर पर स्वयंसेवक जहां हिंदू संस्कृति के मान बिंदुओं की रक्षा का संकल्प लेता है ।वही समाज में समरसता उत्पन्न करने के लिए भी अग्रसर होता है ।इस पर्व पर सभी बंधुओं से मिला कर उन्हें रक्षासूत्र बांधने हम सभी एक ही भारत मां की संतान हैं यह भाव जागृत करने का प्रयास होता है।

रक्षाबंधन पर्व पर देश की  अन्तर्बाह्य की सुरक्षा के लिए भी हम समाज के घटक के नाते क्या-क्या उपाय कर सकते हैं ।इसका विचार भी होना चाहिए देश में बढ़ती असुरक्षा के प्रति जन जागरण अभियान आरंभ करने पर विचार करना आवश्यक है अंन्तर्बाह्य सुरक्षा समाज में आत्मविश्वास को जन्म देगी।

रक्षाबंधन उत्सव का भारतीय समाज में महत्व

 

रक्षाबंधन उत्सव का महत्व – भारतीय समाज जो उत्सव मनाता है उसमें रक्षाबंधन भी एक महत्त्व का उत्सव है। पूरे भारत में यह उत्सव मनाया जाता है। यह उत्सव भी बड़ा प्राचीन है। वैदिक काल की याद दिलाता है। हमारे ऋषि मुनि किसी काल में जंगल में आश्रम बनाकर रहते थे। भगवान राम के बारे में आता है वह वशिष्ठ और विश्वामित्र के आश्रमों में जाकर पढ़े। ‘ गुरु गृह पठन गए रघुराई अल्प काल विद्या सब पाई ‘ पर वर्षा प्रारंभ होने पर यह ऋषि मुनि जंगल को छोड़कर ग्रामों और नगरों की ओर जाते थे ,और उनके आने पर ग्राम व नगरवासी उनकी पूजा अर्चना किया करते थे। सावन भर धर्म – चर्चा कथा वेद व उपनिषदों की व्याख्या चला करती थी।

आज भी ग्रामों में इसी प्रकार रामायण और महाभारत की कथाएं हुआ करती है। हमारे ऋषि – मुनि इस अवसर पर समाज में प्रबुद्ध लोगों को राखी बांधे करते थे। यह राखी इस बात का संकेत थी कि हम लोग पुनः जंगल लौट रहे हैं। हमारे द्वारा बनाई गई शिक्षा एवं संस्कृति की रक्षा का निर्वाह का भार तुम्हारे ऊपर है भूलना मत तभी  से इस को रक्षाबंधन कहते हैं।

 

विदेशी और विदेशी आक्रमणकारियों ने जब इस देश की मातृ शक्ति को अपमानित करने का कुचक्र चलाया। तब हमारी बहनों ने भी यह उत्सव अपनाया है। यह हर वर्ष सावन की पूर्णिमा पर अपने भाई को राखी बांधती या भेजती हैं। वह भाइयों को हर वर्ष याद दिलाती है की हे भाई तुमने हमें विवाह द्वारा दूसरे घर भेज तो दिया पर भूलना नहीं कि हमारी रक्षा का भार तुम्हारे कंधों पर है। और प्रेम व स्नेह का उत्सव आज भी समूचे भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

 

रक्षाबंधन उत्सव का महत्व संघ में – संघ ने इस उत्सव को विशेष रुप से चुना है और उसमे कुछ छोटे से परिवर्तन करके उसको सांस्कृतिक  उत्सव से उठाकर राष्ट्रीय उत्सव भी बना दिया है संघ शाखा पर या सार्वजनिक रूप से जब भी संघ का यह उत्सव मनाया जाता है तो पहली राखी हम अपने राष्ट्र के प्रतीक भगवा ध्वज को बाँधते हैं। और कामना करते हैं कि हमारा राष्ट्र शक्तिशाली हो क्योंकि शक्तिशाली राष्ट्र ही हम सब की रक्षा कर सकता है। फिर प्रत्येक स्वयंसेवक एक – एक  को राखी बनता है। जो इस बात का सूचक है कि हम सब एक हैं बंधु है। हमारा कर्तव्य है मिल जुलकर अपने राष्ट्र की रक्षा करना। इस छोटे से परिवर्तन ने इस उत्सव के सांस्कृतिक महत्व को  और बढ़ाते हुए इस को राष्ट्र निर्माण का उत्सव बना दिया है।

 

हमारे संविधान में स्वतंत्रता शासन समानता और बंधुत्व का इस की प्रस्तावना में भी उल्लेख हुआ है। यह शब्द फ्रांस की क्रांति से लिए गए भारतीय तत्वज्ञान इसके बिल्कुल विपरीत है। यह राज्यसत्ता को कभी  महत्व नहीं दिया गया। बंधे हाथों से जुड़ा हुआ समाज सबसे श्रेष्ठ माना गया। इसलिए विदेशी राज्य आए और वह गए संघर्ष चलता रहा और समाज से जीवित रहा।  हमारा स्वतंत्रता के बाद का इतिहास यह बताता है कि राज्य की शक्ति के द्वारा बंधुता नहीं पैदा की जा सकती है। अगर ऐसा होता तो आज भारत का चित्र दूसरा ही होता । राज्य बंधुता निर्माण करने में सहायक हो सकता है या उसको लाने में बदले  बाधाएं उपस्थित कर सकता  हे ? क्या बंधुता निर्माण करने को एक सिविल कोड बना ? क्या भारत में हिंदू – मुस्लिम  झगड़े समाप्त करने के लिए गौ हत्या पर देशव्यापी प्रतिबंध लगा ? क्या शिक्षा जो धार्मिक मदांध  व्यक्ति पैदा करती है उसके स्थान पर राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली सबके लिए एक सी निर्माण की ? मिजोरम में पाबंदी लगी हुई है कि वह ईसाई पादरी तो घुस सकते हैं पर मानव धर्म धर्म प्रचारक नहीं। जो वहां के प्राचीन धर्म के प्रति कौम  को जागृत करना चाहते हैं। क्या यह बंधुता के प्रचार में बाधा नहीं है। वास्तव में राज्य मिलना समानता ला सकता है और न बंधुता। क्या अच्छा होता कि यदि नकल उतार नीति तो बंधुता को प्रथम स्थान दिया जाता है।

 

वास्तव में बंधुता  ही समानता की जड़ है। जब तक बंधुता ना हो जब तक सब लोग अपने परिवार का अंग ना समझे उस में समानता कैसे हो सकती है ? आर्थिक बात का इतना महत्व नहीं जितना भावात्मक बात का। और बंधुता और समांतर जब दोनों लोग हो जावे तो राष्ट्रीय स्वतंत्र कैसे रहेगा ? स्वतंत्रता कुछ लोगों के प्रयत्न से आएगी पर कभी भी जा सकती है। उसके अमृतमय फल चखने को नहीं मिल पाते। विभिन्न समस्याएं खड़ी होती रहती हैं और राज्य खुद दोषी न बन कर दूसरों को दोष देता रहता है।रक्षाबंधन का महत्व अद्भुत है |

 

केरल प्रांत में इतनी भयानक छुआछूत की स्वतंत्रता के समय संविधान में छुआछूत समाप्त की गई। कांग्रेस व कम्युनिस्ट मंत्रिमंडल बने तथा अछूतों को कुछ सुविधाएं मिल गई और कुछ सीटें मिल गई कुछ आर्थिक लाभ हो गया पर क्या वह समाज में समानता के अधिकार समाप्त कर सके ? कुछ मंदिरों में दर्शन करने से क्या समस्याएं हल हो गई विदेशी धन उनको इसाई वह मुसलमान बनने को खींच रहा है। केरल में संघ कार्य बड़ा शाखाएं खुली यह रक्षाबंधन का उत्सव ग्राम ग्राम नगर नगर मनाया जाने लगा उसने बंधुत्व की भावना पैदा कि सब एक परिवार के अंग बन गए और उनको यह समानता का अधिकार अनायास ही मिल गया। आज केरल प्रांत में पराया छुआछूत समाप्त हो गई है। जो कम्युनिस्ट थे आज वह संघ  शाखाओं में दिखाई देते हैं।

 

आज हमारे राष्ट्र में ऐसे उत्सव को मनाने की नितांत आवश्यकता है। संग का लक्ष्य समाज के हर घटक  को उसने भावना के सूत्र में आबद्ध कर समस्त देश को सुगठित करना है। पिछले २५ ००० वर्ष का इतिहास भी हमको यही शिक्षा देता है कि बंधुता का आरोप होने के कारण राष्ट्र एक रुप होकर खड़ा ना हो सका। देश में शक्तिशाली शासन के वीर योद्धा थे शस्त्र थे जब राणा सांगा का बाबर से युद्ध हो रहा था उस समय दक्षिण में विजयनगर का हिंदू साम्राज्य अपने पूर्ण वैभव पर था। अगर वह राणा सांगा की मदद कर देता तो राणा सांगा तो बाबर को उठा कर दूसरे देश में फेंक आते। पानीपत के तीसरे युद्ध में भी यही हुआ जब मराठों की और अब्दाली और मुस्लिम शक्तियों के बीच निर्णायक युद्ध हो रहा था। तब हमारे राजपूताने के वीर खड़े हुए जब जब भी संगठित होकर खड़े हुए तो हमने उन आक्रमणकारियों की सत्ता को समाप्त कर दिया।

 

हमने अपने ही समाज में के एक अंग से बंधुता और समानता का भाव रखना छोड़ दिया ऐसा होने पर ही धन का कुचक्र चले जाता है आज देश में भाषावाद प्रांतवाद उत्तर दक्षिण के विभिन्न था विरादरी क्यों भर रहे हैं?

इन सब का कारण बंधुता पर जोड़ना देना है आज जो समस्याएं देश को निगल जाने का को मुंह बनाए खड़ी है उनका एक ही उपचार है संगठन और संगठन बंधुता यानी पारिवारिक आधार पर संग इसी में लगा है।

यदि हम बंधुता पर जोर देने वाले कार्यक्रम लेकर देश के कोने-कोने में इस समाज को जगाए तो यह आवश्यक रूप होकर खड़ा हो सकेगी यही राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया है इसमें हमारी संस्कृति कितनी सहायक हो सकती है यह रक्षाबंधन हमारा सांस्कृतिक उत्सव है। संस्कृति राष्ट्र की आत्मा होती है बंग भंग के समय कविवर रविंद्रनाथ ठाकुर ने 50000 लोगों के साथ गंगा में स्नान किया था और राखी बांधकर उसे अजय शक्ति को जगाया था जिसने ब्रिटिश शासन को हिला दिया और उन्हें बंग-भंग समाप्त करना पड़ा हमारा रक्षाबंधन का उत्सव इन्हीं बातों का संदेश देता है।रक्षाबंधन उत्सव का महत्व यही है | 

इस भगवा प्लेटफार्म से हम हिंदू अथवा हिंदुस्तान के लोगों से एक सभ्य व शिक्षित समाज की कल्पना करते हैं। जिस प्रकार से राम – राज्य में शांति और सौहार्द का वातावरण था वैसे ही राज्य की कल्पना हम इस समाज से करते हैं।

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