Subhashita in hindi for rss utsav | सुभाषित आरएसएस

Subhashita collection in hindi important for rss utsav 

सुभाषित – Subhashita

These are some short Subhashita in sanskrit. And we have provided hindi meaning also of these quotes. So read and comment below your thoughts.

अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम।

उदार चरिता नाम तु वसुधैव कुटुंबकम। ।

अर्थ –  यह मेरा है , वह पराया है , ऐसी गणना छोटे हृदय के लोग करते हैं। विशाल हृदय वालों के लिए तो सारी पृथ्वी ही कुटुंब अर्थात अतिथि के समान है।

 

रहिमन रहिला की भला , जो परसे चितलाय।

परसत मन मैला करे , मैदा हूँ जरि जाय। ।

अर्थ – रहिमनदास कहते हैं कि अगर प्यार से खिलाए तो भूसी की रोटी भी अच्छी लगती है , और बुरे मन से परोसने पर मैदा के व्यंजन भी रुचिकर नहीं लगते हैं।

 

तुलसी पिछले पाप से हरि चर्चा न सुहाय।

जैसे स्वर के बेग से भूख विदा हो जाय। ।

अर्थ – तुलसीदास जी कहते हैं कि , पिछली बड़ी भूलों के कारण उन्नति के लिए की गई चर्चा उसी प्रकार नहीं सुहाती , जिस प्रकार बुखार के रोगी की खाने की इच्छा समाप्त हो जाती है।

 

जितने कष्ट कंटको में है जिसका जीवन सुमन खिला।

गौरव गंध उन्हें इतना ही , यत्र तत्र सर्वत्र मिला। ।

अर्थ – जिन्होंने जितनी अधिक विप्पत्तियों कष्टों  में अपना जीवन यापन किया है। उन्हें उतना ही अधिक आदर सम्मान मिला है।

 

अमन्त्रम अक्षरं नास्ति , मूलमनौषधं।

अयोग्य पुरुषः नास्ति , योजकस्त्र दुर्लभः।।

अर्थ – ऐसा कोई अक्षर नहीं जिसका मंत्र न बन सके। ऐसी कोई जड़ी – बूटी नहीं जिसकी औषधि न बन सके , ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जिसे अयोग्य करार दिया जाए।  केवल उचित योजक होना ही दुर्लभ है।

 

सर्व धर्म समा वृत्तिः ,सर्व जाति समा मतिः।

सर्व सेवा परानीति रीतिः संघस्य पद्धति। ।

अर्थ – सभी धर्मों के साथ समान वृत्ति सभी जातियों के साथ समानता की मति बुद्धि , सभी लोगों के साथ परायणता का व्यवहार संघ की पद्धति है।

 

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

न हि सुप्तस्य सिंघस्य प्रविश्यन्ति मुखे मृगाः। ।

अर्थ – प्रत्यक्ष करने पर ही किसी कार्य में यश मिलता है , केवल मनोरथ पूरी करने से कार्य सिद्ध नहीं होते। सोए हुए सिंह  ( शेर ) के मुख में अन्य प्राणी जाकर स्वयं ग्रास नहीं बनते। अर्थात सिंह को भी भूख शांति करने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है।

 

विद्या ददाति विनयं विन्यात याति पात्रताम।

पात्र्त्वात धनमाप्नोति धनात धर्म ततः सुखम। ।

अर्थ – विद्या विनम्रता देती है विनम्रता से पात्रता आती है पात्रता से धन की प्राप्ति होती है। धन से धर्म और सुख प्राप्त होता है।

 

जे रहिम उत्तम प्रकृत्ति का करि सकत कुसंग।

चन्दन विष व्यापत नहीं , लपटे रहत भुजंग। ।

अर्थ – जो मनुष्य उत्तम प्रकृति के होते हैं उन पर बुरी संगत से कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जैसे चंदन के पेड़ पर सर्प ( सांप )लिपटे रहने से चंदन की खुशबू नहीं जाती। अर्थात अच्छे मनुष्य बुरे लोगों को भी अच्छा बना देते हैं।

 

आलसस्य कुतो विद्या , अविद्यस्य कुतो धनम।

अधनस्य कुतो मित्रं , अमित्रस्य कुतः सूखम। ।

अर्थ – आलसी आदमी को विद्या कहां से प्राप्त होगी।  जिसके पास विद्या नहीं उसे धन कैसे मिलेगा। धन ना हो तो मित्र कैसे मिलेगा और मित्र ना हो तो उसे कैसे सुख मिलेगा।

 

पुस्तकस्था तू या विद्या , परहस्तं गतं धनम।

कार्यकाले समुत्पन्ने , न सा विद्या न तत धनम। ।

अर्थ – पुस्तक में स्थित लिखित विद्या दूसरे के हाथों में गया हुआ धन कार्य के समय आवश्यकता पड़ने पर न धन काम आता है और न वह विद्या।

 

येषां न विद्या न तपो न दानं , ज्ञानं न गुणों न धर्मः ,

ते मर्त्य लोके भुवि भरभूताः मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति। ।

अर्थ  – मनुष्य जन्म लेकर भी जिसने विद्या प्राप्त नहीं की और ना ही जिसने तपशील दान-धर्म जैसे गुणों को अपनाया वह मनुष्य रूप में पशु की भांति पृथ्वी पर भार बनकर जीवन व्यतीत करता है।

 

नत्वहम  कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम। 

कामये दुःखं , तत्तानाम प्राणिनाम अर्यतनाशम। । 

अर्थ – न तो मैं राज्य चाहता हूं , ना स्वर्ग और ना मोक्ष की कामना करता हूं। ईश्वर मैं दुख से तत्व प्राणियों के दुखों को नष्ट करना चाहता हूं।

 

चन्दनं शीतलं लोके , चन्दनादपि चंद्रमाः। 

 चंद्रचंदनयोर्मध्ये  शीतला साधुसंगति:| | 

अर्थ – संसार में चंदन को शीतल माना जाता है , लेकिन चंद्रमा चंदन से भी शीतल होता है। अच्छे मित्रों का साथ चंद्र और चंदन दोनों की तुलना में अधिक शीतलता देने वाला होता है।

 

यथादृष्टिः  शरीरस्य  नित्यमेवप्रवर्तते। 

तथा नरेन्द्राराष्ट्रस्यप्रभवहः सत्यधर्मेयोः। । 

अर्थ  – जैसे – जैसे दृष्टि शरीर के हित में प्रवृत्त होती है उसी प्रकार राजा – राज्य के भीतर सत्य और धर्म का प्रवर्तक होता है।

उद्यमं सक्षमं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः।
षडेते यत वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत। ।

अर्थ – प्रयास , साहस  , धैर्य  , बुद्धि , शक्ति तथा प्रक्रम जहां यह छः  गुण होते हैं , वहां देव भी सहायक होते हैं।

नहि वेरेन वेरानि , सम्मंतीथ कुदाचन।
अवेरेन च सम्मन्ति , एस धम्मो सनन्तनो। ।

अर्थ – वैर से कभी वैर  शांत नहीं होता और वैर स्नेह (प्रेम) से ही शांत होता है , यही सनातन धर्म है।

 

यतो यतो निश्चिरति मनश्चञ्चलमस्थिरम।
ततस्तस्तो नियम्यैतद , आत्मन्येव। ।

अर्थ – यह चंचल और अस्थिर मन जहां-जहां विचलित होता है , वहां उसे नियंत्रित करके स्वयं को वश में करना चाहिए।

 

वृक्ष कबहूँ नहिं फल भखै , नदी न संचै नीर।
परमारथ के कारने , साधुन धरा शरीर। ।

अर्थ – वृक्ष कभी अपना फल स्वयं नहीं खाते , नदी अपने लिए जल संग्रह नहीं करते , सज्जनों का जीवन भी परोपकार के लिए होता है।

 

वाणी रसवती यस्य ,यस्य श्रमवती क्रिया।
लक्ष्मी दानवती यस्य , सफलं तस्य जीवनम्। ।

अर्थ – जिसकी वाणी में मधुरता और परिश्रमशील है तथा जिसका धन दान के लिए है उसका जीवन सफल माना जाता है।

 

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं नर – पशु निरा और मृतक समान है। ।

अर्थ –  जिसको अपने गौरव वह अपने जीवन पर अभिमान नहीं है , वह व्यक्ति मनुष्य होने पर भी मनुष्य नहीं है। वह पशु के समान है और मृतक के समान है।

 

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